Sunday, 29 June, 2008

पगली

पगली हाँ सबतों वड्ड़ी मैं कहांदी
जिंद कटलां मैं तेरी राहां चे पलकां बिछांदी


अनंत आनंद गुप्ता

Wednesday, 16 January, 2008

ऋचा

चंचल शीतल उज्वल निर्मल
पंखुड़ी जैसी है वो कोमल
लहराती बहलाती बलखाती इठलाती
नदी सी है वो नटखट
उछलती कूदती चलती ठहरती
पवन सी है वो सरपट
सुनहरी सलेटी गुलाबी सफ़ेद
निशा सी है वो सुंदर
पवित्र मधुर सुरीली अकथ
ऋचा सी है वो पावन


अनंत आनंद गुप्ता

विश्वास


छोटी-छोटी सी बातें
दिल को है छू जाती
और रिश्ते है बन जाते
पल भर मे ही अचंभित
हम है रह जाते
और जब हम है खोजते
शब्द नहीं मिलते
ना ही मिलता कोई कारण
बस होता है ये आभास
उस अनजाने से चहरे पे
इस दिल को है पुरा विश्वास


अनंत आनंद गुप्ता

पहला इज़हार


दिल कहे तुमसे हुआ हमको प्यार,
इज़ाजत जो हो तो करें इज़हार,
करवालो करेंगे उम्र भर इंतज़ार,
पर गुज़ारिश है इतनी ना करना इंकार।


अनंत आनंद गुप्ता

लिखता रहूँगा


तब तक लिखूंगा
जब तक
मेरी भावनाओ को
शब्दो का घर मिल ना जाये
और मिल ना जाये जब तक
एक कोना मुझको
दिल मे तेरे फूल एक
खिल ना जाये तब तक


अनंत आनंद गुप्ता

तेरा साथ


मेरे एहसासों का एहसास है तुझे?
मेरी तरह जिन्दगी की प्यास है तुझे?
भटक रह हूँ ना जाने किस चीज़ की तलाश में
मंज़िल को पाना भले ही मुमकिन ना हो
पर दुआ है तेरा साथ तो रहे


अनंत आनंद गुप्ता

कल हो ना हो


आज एक बार सबसे मुस्करा के बात करो
बिताये हुये पलों को साथ साथ याद करो
क्या पता कल चेहरे को मुस्कुराना
और दिमाग को पुराने पल याद हो ना हो

आज एक बार फ़िर पुरानी बातो मे खो जाओ
आज एक बार फ़िर पुरानी यादो मे डूब जाओ
क्या पता कल ये बाते
और ये यादें हो ना हो

आज एक बार मन्दिर हो आओ
पुजा कर के प्रसाद भी चढाओ
क्या पता कल के कलयुग मे
भगवान पर लोगों की श्रद्धा हो ना हो

बारीश मे आज खुब भीगो
झुम झुम के बचपन की तरह नाचो
क्या पता बीते हुये बचपन की तरह
कल ये बारीश भी हो ना हो

आज हर काम खूब दिल लगा कर करो
उसे तय समय से पहले पुरा करो
क्या पता आज की तरह
कल बाजुओं मे ताकत हो ना हो

आज एक बार चैन की नीन्द सो जाओ
आज कोई अच्छा सा सपना भी देखो
क्या पता कल जिन्दगी मे चैन
और आखों मे कोई सपना हो ना हो

क्या पता
कल हो ना हो ...


अनंत आनंद गुप्ता

कविता मेरी


जो थी कभी मेरी अपनी, ना जाने क्यों परायी हो रही है
जानी पहचानी लगती थी, कैसे गुमनाम हो रही है
कोशिश की बहुत समझने की, फिर भी बेमानी सी हो रही है
हर शब्द याद है मुझे, पर कविता मेरी खो रही है


अनंत आनंद गुप्ता

खुदगर्ज़


खुदगर्ज़ हैं वो जो अपने प्यार पर गुमां करते हैं
नहीं जानते कि मोहोब्बत सभी को होती है
पर जिंदा है वोही जो बस उनके नाम पर मरते हैं
ख्वाहिशें करना ही काफी नही है दोस्त उनके मिलने की
तूफानों से गुज़र सकते हैं हर कोई यहाँ
पर मंज़िल मिली है उन्हें जो उम्र भर उम्मीद के साथ चल सकते हैं


अनंत आनंद गुप्ता

अरमां


यूं मसला अरमानों को कि
खुद को मिटाते चले गए
हसते रहे तेरी बेवफाई पर
और दिल को रुलाते चले गए
बसाई थी जो ख्वाबों की बस्ती
उसका हर तिनका लुटाता चले गए
कुछ ना पूछो अब हम से कि
हम खुद को भुलाते चले गए


अनंत आनंद गुप्ता

राज़


राज़ क्या है जिंदगी का
नहीं ये कोई भी जान पाया
कहीँ ख़ुशी का उजाला है तो
कहीँ ग़मों का काला साया
कहीँ खुद ही से लड़ती रूह है तो
कहीँ जलती हुई नश्वर काया
इक वृत्त जैसी लगती है कि
खो जाती है वैसे, जैसे था पाया
क्यों भटके है तू राही कि
इक ही ओर इसने सबको ले जाना
बचपना है कि हर चीज़ पाने को मचले
सब जानती है कि बुढ़ापा है छाया
राज़ क्या है जिंदगी का
नहीं ये कोई भी जान पाया


अनंत आनंद गुप्ता

जाम ए शाम


ना पैमाना लबों तक पंहुचा
ना ही पीया हमने कोई ज़ाम
बहोत ख़ूब गुज़री फिर भी
नशे मैं रहे हम कल की शाम


अनंत आनंद गुप्ता

होश


होश वालों शिक्वा ना करो कि
हम भी होश की बातें करेंगे
हमें ज़रा होश में तो आने दो
ख़्वाब लेने का हक सबका है
ख़्वाब होंगे हमारे भी सच्चे
ज़रा झूठे ख्वाब से बाहर तो आने दो


अनंत आनंद गुप्ता

चाहत


तुम्हे बस चाहते जाने को जी चाहता है
आज कुछ कर जाने को जी चाहता है
तुम्हारे संग जीने को जी चाहता है
तुम पर मिट जाने को जी चाहता है
चाहते हैं हम तुम्हे जितना उतना
आज बस कह जाने को जी चाहता है
हमें चाहत हो सिर्फ तुम्हारी
ऐसी चाहत हो ये जी चाहता है
दिल पर ज़ोर नही है पर
ये दिल सिर्फ तुम्हे चाहे ये जी चाहता है
महोब्बत की ग़र कोई हद होती है तो
आज उस हद से गुज़र जाने को जी चाहता है
जो देखा तुमको एक बार हमने
तो अब देखते जाने को जी चाहता है


अनंत आनंद गुप्ता